tag:blogger.com,1999:blog-145449172008-03-09T21:15:35.002-08:00ब्रज से दूर ब्रजवासी की चिट्ठियाँSankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.comBlogger12125tag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-24939624164801910932008-03-09T21:14:00.000-08:002008-03-09T21:15:35.012-08:00ke23edSankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1165125247011622912006-12-02T21:46:00.000-08:002006-12-02T21:55:02.400-08:00चलो एक बार फिर से॰॰॰हिन्दी ब्लाग जगत के साथियों।<br /><br />एक बडे अन्तराल के बाद ये ब्रजवासी वापास आ रहा है।<br /><br />बहुत कुछ बदला है, शादी, स्थान, नौकरी और डिग्री<br />फिर भी लगता है, एक दम वैसी ही है जिन्दगी<br /><br />आशा है जल्दी जल्दी लिखने का मौका मिलेगा॰॰॰Sankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1125078511738572972005-08-26T09:46:00.000-08:002005-08-26T10:39:25.280-08:00बिजली और मिठाई की जंग से आजादी... कब?<span style="color:#663366;">एक हमारे मित्र हैं "सैनी साहब", अपने देश के दूसरे सबसे अच्छे प्रदेश, </span><a href="http://www.upgov.nic.in/"><span style="color:#663366;">यू० पी० </span></a><span style="color:#663366;">के बाशिन्दे हैं हमारी तरह। शहर धामपुर, जिले </span><a href="http://www.bijnoronline.com/"><span style="color:#663366;">बिजनौर</span></a><span style="color:#663366;"> की एक तहसील, </span><a href="http://www.dhampur.com/"><span style="color:#663366;">चीनी मिल</span></a><span style="color:#663366;">, खांडसारी और अब सैनी साहब की वजह से </span><a href="http://www.up-tourism.com"><span style="color:#663366;">मशहूर। </span></a><span style="color:#663366;">उमर - पचीस बसंत देख चुके हैं और अपने हाथों की कला से ना जाने कितने लोगों के बसंत को आनन्दित बना चुके हैं। शादियों में ना जाने कितनों का मुँह मीठा करवा चुके हैं। अरे भाई आसानी से सोचा जा सकता है कि मिठाई बनाने का काम करते हैं सैनी साहब, और अगर एक शब्द के प्रयोग की चुनौती दी जाये तो बिना किसी आपॅसन के ताला लगा सकते हैं कि हलवाई हैं हमारे सैनी साहब। लोगों के गले को मीठा बनाये रखते हैं चाहे कुछ भी हो जाये। और हर किसी के मुँह से आप इनकी तारीफ सुन सकते हैं।<br /><br />हर किसी की तरह अपने बेचारे कई महीनों से परेशान थे, कोई </span><a href="http://www.made-in-china.com/"><span style="color:#663366;">मेड इन चाइना</span></a><span style="color:#663366;"> मशीन आ गयी, और मिठाई बनाने वालों की मिठाई के साथ साथ असली बरक वाली चांदी भी होने लगी। बिजली नहीं थी, फिर भी बाकी हलवाई बन्धु किसी तरह से मैनेज कर लेते थे। सैनी साहब दुखी, हमारे एक पुराने दोस्त जो धामपुर में रहते है, के पास गये और दुख भरी पाती कम्प्यूटर से भेज दी। हमको भी बङा दुख हुआ पर हम क्या कर सकते थे। सबसे ज्यादा बुरा उनको इस बात का लगा कि हमारे घर भी हब उनके यहाँ से मिठाई नही जाती। लिखा था, "अरे भैया जब आप </span><a href="http://mathuravrindavan.com"><span style="color:#663366;">मथुरा</span></a><span style="color:#663366;"> वाले होकर भी हमसे नहीं खरीदते तो और कौन?"। हमने घरवालों को समझा दिया। पर उनको भी कहा कि वो भी मशीन वाली मिठाई बनाया करें, आखिर </span><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Outsourcing"><span style="color:#663366;">आउट्सोर्सिंग</span></a><span style="color:#663366;"> का ज़माना है। हमने लिखा, "वैसे तो कहा जाता है और इतिहास भी गवाह है कि अपने अधिकतर महापुरूषों ने मौहल्ले की सङक की रोशनी में बैठकर पढाई की। पर भैया अब देश आजाद हो चुका है, सो बिजली ही जीवन है"।<br /><br />पाठकों, बचपन से एक ख्याल दिल में आता था कि क्यों ना बङा बनने का शार्टकट निकाला जाये और एक सेकेन्ड में ही बङा आदमी बना जाये (असली महापुरूषों से क्षमा चाहता हूँ)। वैसे तो देश की सरकार वो जरूर करती है जो हम न चाहे पर हमारी ये छोटी सी ख्वाहिश पूरी होने में हमारी सरकार ही हमारी मदद करती है, सो महान बनने का आसान इंतेजाम।<br /><br />वापस सैनी साहब पर, वो बोले कि "भैय्या बिजली आती ही नहीं है, और जनरेटर के पैसे कहाँ से लाये?" कम्प्यूटर वाली डाक से समझाने की बङी कोशिश की पर वो और दुखी रहने लगे। और कुछ दिन बात ही नहीं हुई। फिर सुना कि वो अपने यू० पी० की सियासत के केन्द्र लखनऊ चले गये </span><span style="color:#663366;">अपने मौसा जी के पास, हलवाई गिरी का और ज्यादा अनुभव लेने, पर धामपुर आते रहते और बिजली को कोसते रहते जिसका हाल लखनऊ में भी कोई अच्छा नहीं था। पर, बिना कनैक्शन की बिजली थी तो उनके मौसा जी को कोई दिक्कत नहीं थी। ऐसे ही लखनऊ और धामपुर के बीच हलवाईगिरी के गुर सीखते समय कट रहा था उनका। पर बिजली के कारण दुखी बहुत थे सैनी साहब।<br /><br />कल अचानक </span><a href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1211177,curpg-2.cms"><span style="color:#663366;">अखबार</span></a><span style="color:#663366;"> पढा तो पहले दुख से और फिर गर्व से सीना चोङा हो गया। आखिर बारहवी तक वहाँ ही रहे हैं हम, अपना ही शहर है धामपुर। सारे जहाँ के अन्तरजालों पर छा गया हमारा शहर केवल सैनी जी के कारण।</span><br /><span style="color:#663366;"></span><br /><span style="color:#663366;">सबसे ज्यादा दुख तो इस बात का हुआ कि सैनी जी चढे भी तो ४० मीटर ऊँचे मोबाइल की एक कंपनी के खंबे पर। हम कह रहे थे कि आजादी के दिन फोन क्यों नहीं लग रहा, हमको क्या पता था कि हमारे सैनी साहब विराजे हुये हैं वहाँ तो। क्या स्वागत हुआ उनका, घर से पता चला, काश हम भी वहाँ होते तो हम भी एक मेड इस चाइना माला पहना दिये होते इनको। सैनी साहब के कुछ शब्द :- </span><br /><span style="color:#663366;"><em></em></span><br /><span style="color:#663366;"><em>"अगर आपको खुद पर भरोसा है तो आप कुछ भी कर सकते हैं। मैं यह बताना चाहता था कि आप आदमी भी कोई चीज है।"</em></span><br /><span style="color:#663366;"><p><br /><em>"हम गरीबों के पास इज्जत और बिजली होना बहुत जरूरी है।"</em></p><p><br /><em>"ये मेरी लाइट् और मेरी जिन्दगी की जंग है।"</em></p><p><br /><em>"ऊपर से धामपुर एकदम जन्नत लग रहा था। इतना सुन्दर मुझे मेरा शहर कभी नहीं लगा।</em> "</p><p>जियो सैनी भैय्या, सुनने में आया है कि मुकदमा चल रहा है जनाब पर और बिजली जस की जस या कहें तो उससे भी बुरा हाल। उम्मीद है कोई और मोबाइल कम्पनी आयेगी और ४० मीटर से भी ऊँचा खंबा बनवायेगी। जनता को उम्मीद है मिठाई की मिठहास से खुश रहने वाले लोग बिजली से फिर जंग छेङेंगे, फिर कोई सैनी साहब आयेंगे और इस बार कम से कम एक हफ्ते के लिये बिजली और मिठाई की जंग से मुक्ति दिलवायेंगे।</span></p>Sankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1122832527581027212005-07-31T09:47:00.000-08:002005-08-02T10:38:04.106-08:00प्रेमचंद साब का जन्मदिन<p align="center"><a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/specials/736_premchand_paints/"><img style="WIDTH: 155px; CURSOR: hand; HEIGHT: 179px" height="179" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7046/1319/200/582548_premchand_sonkaria033.jpg" width="132" border="0" /></a></p><p align="justify"><span style="color:#6600cc;">एक महान लेखक या कहें कि एक आम आदमी के रोजमर्रा की जिन्दगी से हमेशा मुखातिब रहने वाले प्रेमचंद जी को फिर से याद कर रहे हैं हम--- उनके १२५वें जन्मदिन पर। मुझे लगता है कि उनकी कहानियाँ ऐसी कहानियाँ हैं जो एक सामान्य आदमी आसानी से समझ सकता है। बचपन से याद है कि हम कर्मभूमि, निर्मला देखा करते थे। छोटे थे हम लोग, फिर भी रात ८॰४० के समाचार के बाद इंतजार रहता था। वो भी क्या दिन थे। इसका श्रेय प्रेमचंद जी को ही जाता है। शायद सारे धारावाहिक ही मध्यम परिवारों पर केन्द्रित थे--- न कि आज की तरह, समझ नहीं आता कि आखिर आज के सारे कथित औपेरा किस के लिये बने हैं?</span> </p><div align="center"><a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/specials/736_premchand_paints/">बी॰ बी॰ सी॰ पर - तस्वीरों में चित्रकारों की नज़र में प्रेमचंद</a></div><div align="center"><a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/cluster/2005/07/050729_premchand_anniversary.shtml">बहुत सी और बातें और विचार</a></div><div align="center"><a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/specials/1456_premchand_gpur/">प्रेमचंद का दूसरा घर गोरखपुर</a></div>Sankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1122142251603168502005-07-23T10:09:00.000-08:002005-07-23T10:10:51.606-08:00लंदनबस, खाली बैठा था तो सोचा कि कुछ लिख दूँ । आज सप्ताहांत का दिन था कुछ खास नहीं हुआ । एसे ही बीत गया ।<br /><br />रीडिफ पर पढ रहा था कि लंदन में जो आदमी पुलिस ने मारा था वो कोई आम आदमी ही था । मतलब, लंदन पुलिस भी गलतियाँ करती है । किन्तु यह मेरे लिए बहुत ही आश्चर्यजनक बात है कि आतंकवादियों के हौसले इतने बुलंद हो गये हैं कि वो अब लंदन जैसे सुरक्षित (मुझे लगता है कि लंदन सुरक्षित था ) शहरों में भी खुलेआम विस्फोट करते हैं । हिन्दुस्तान जैसे देश तो आतंकवाद से जूझ ही रहे हैं और आतंकवादी आए दिन कुछ न कुछ गुल खिलाते ही रहते हैं । यदि इन विस्फोटों की प्रतिक्रया ब्रिटेन भी अमेरिका की तरह ही करता है तो उसे पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिए जैसा अमेरिका ने अफगानिस्तान पर किया था । यह तो साबित हो ही चुका है कि हमलावरों ने पाकिस्तान में जाकर मदरसों मे जिहाद की शिक्षा पाई थी (मुझे पता नहीं इसे शिक्षा क्यों कहा जाना चाहिए) । यदि अमेरिका और अन्य देश आतंकवाद को जङ से खतम करना चाहते हैं तो उन्हें पाकिस्तान पर लगाम कसनी ही होगी । पाकिस्तानी मदरसों का आतंकवाद फैलाने में बङा हाथ हो सकता है ।<br /><br />किन्तु अमेरिका हमेशा से ही दोहरी नीति करता आया है । वो एशिया में अपनी पैठ बनाने के लिए पाकिस्तान की जमीन चाहता है । और इसीलिए वो हमेशा से पाकिस्तान का हिमायती रहा है ।अमित अग्रवालhttp://www.blogger.com/profile/12907534850888833082noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1122112133036231322005-07-23T01:48:00.000-08:002005-07-23T11:25:45.656-08:00चिठ्ठासंकेत साहब ,<br /><br />हमारे चिठ्ठे को बहुत लोगों ने पढा है । कई लोगों ने तो टिप्पणी भी की है । देख कर अच्छा लगा। मुझे समझ यह नहीं आया कि लोगों को हमारे चिठ्ठे के बारे में पता कैसे चला?<br /><br />मैं दूसरे लोगों के चिठ्ठे कैसे पढ सकता हूँ? क्या कहीं पर चिठ्ठे वर्गीकृत करके जाल पर रखे गये हैं?<br /><br />अमितअमित अग्रवालhttp://www.blogger.com/profile/12907534850888833082noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1122028314817383352005-07-22T02:25:00.000-08:002005-07-22T04:32:54.013-08:00शोध का लड्डूसंकेत साब,<br /><br />शोध का लड्डू , जैसा आपने कहा, जो खाए वो भी पछताए और जो न खाए वो भी ः) लेकिन चलता है यार , किया कुछ भी नहीं किया जा सकता ।<br /><br />जो कुछ ऊपर वाले ने लिख दिया है वो तो होना ही है । तो फिर मजे क्यों न किए जाए । मुझे लगता है कि कुछ भी हो जाए हमें मजे में ही रहना चाहिए । तभी जिन्दगी बढिया है । आपका क्या कहना है इस विषय पर?<br /><br />अमितअमित अग्रवालhttp://www.blogger.com/profile/12907534850888833082noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1121994311709004872005-07-21T17:01:00.000-08:002005-07-23T11:44:29.116-08:00जिन्दगी के दो लड्डू - क्या ख्याल है अमित भाई?<span style="color:#666600;">अमित भाई! स्वागत है आपका, इस चिट्ठा-संसार में।</span><br /><br /><span style="color:#666600;">वैसे तो साक्षात् आपसे एक बार मिला हूँ; या कि दो बार, पर पहली मुलाकात के बारे में बाद में बाद में ही पता चला ;) पर शायद पहली मुलाकात ही अब तक की दोस्ती का आधार है, शायद---बहुत कुछ सीखा है आपसे कह सकता हूँ इस दौरान--- वो बंगलौर की यादें, आगरे वाले के समोसे और एम॰ जी॰ रोड का टा्इम पास, सब याद है। और हाँ हम दोनों और हम जैसे ना जाने कितने एक ही नाव के सवार साथी हैं, वो है, शोध की नाव, पी॰ एच॰ डी॰ की नाव--- </span><br /><br /><span style="color:#666600;">शायद लोग सही कहते हैं कि एक शोधार्थी की हमेशा दो शादियाँ होती है और उसके लिये उसको धर्म नही बदलना पङता (वो आंगल भाषा में क्या कहते हैं, "just kidding"). पी॰ एच॰ डी॰ पहली होती है, असली वाली शादी की तरह एक लड्डू है ये भी, "जो खाये वो पछताये, जो ना खाये ललचाये"--- जिसको यह डिग्री मिले वो कम से कम डिग्री मिलने के बाद तो खुश होता ही है, अगर ४-५ साल ना भी हो तो। और जो यह डिग्री ना ले पाये तो बस इक ही बात रहती है - पी॰ एच॰ डी॰- पी॰ एच॰ डी॰- पी॰ एच॰ डी॰। यह बात मैं अपने अलग अलग दोस्तों के ई-पत्र व्यवहार से आसानी से निकाल सकता हूँ। तो हम और आप यह लड्डू खा रहे हैं, पहला लड्डू- और अभी तो बडा वाला भी लड्डू खाना है यह जानते हुये भी कि कहीन और ज्यादा ना पछताना पडे, शायद इसी कारण पी॰ एच॰ डी॰ के लड्डू का पछताना महसूस ही नहीं होता ;)। </span><br /><br /><span style="color:#666600;">एक छोटा सा संदेश या कहूँ कि मन की बात कहना चाहूंगा सारे शोधार्थी दोस्तों के लिये (<a href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=14544917&postID=112199431170900487">आपके विचार चाहूँगा</a>)- मुझे लगता है कि जैसे खाने के बाद मिठाई खाने का प्रचलन है, पी॰ एच॰ डी॰ के लड्डू को बस एक मिठाई समझ कर खाना चाहिये। जीवन चलते रहना चाहिये, इक सामान्य जीवन की तरह। समय है, बहुत है, २४ घंटे हैं ना भाई-- तो केवल यह समझकर कि "भाई पी॰ एच॰ डी॰ कर रहे है न", दुनिया से दूर न रहें, बल्कि ये तो दुनिया के और करीब आने का माध्यम बनना चाहिये। शायद कुछ ज्यादा और समझ से अधिक लिख रहा हूँ, पर शायद चिट्ठा इसी का नाम है, क्यों अमित साब?</span><br /><br /><span style="color:#666600;">देखा अपनी बात मैं खुद ही नहीं अपना रहा- शाम की चाय के समय पी॰ एच॰ डी॰ की बात- ये तो डेजेर्ट पर सोचने वाली बात है ;) मेरे हिसाब से, शोध की बात यहीं तक, बाकी बाद में, शायद शाम के खाने के बाद। फिर मिलेंगे।</span>Sankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1121963821275200542005-07-21T08:36:00.000-08:002005-07-21T10:40:32.880-08:00हिन्दीयह मेरा पहला चिठ्ठा है । अभी तो मैं चिठ्ठाकारी के बारे में कुछ जानता भी नहीं हूँ । मुझे पहले तो बहुत संकोच हुआ लेकिन फिर सोचा एक ना एक दिन तो संकोच दूर करना ही होगा । मुझे इसके लिए संकेत जी को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होने मुझे इसके लिए प्रेरित किया । चीनी भाषा में एक कहावत है, १००० मील की यात्रा भी पहले कदम से ही शुरू होती है । तो इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैं इस चिठ्ठा संसार में कदम रखता हूँ । यह केवल एक प्रयोग है देखना चाहता हूँ कि यह जाल पर कैसे पोस्ट होता है और फिर कैसा लगता है?<br /><br />अमितअमित अग्रवालhttp://www.blogger.com/profile/12907534850888833082noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1121882676791710992005-07-20T09:51:00.000-08:002005-07-20T10:04:36.796-08:00३० साल पहले की वो रात (जून २६, १९७५)देश में आपातकाल - बहुत सुना है, बडों से - दादाजी, पिताजी --- इस साल उस आपातकाल की तीसवी सालगिरह है। जून २६, १९७५ से मार्च २१, १९७७ का समय २१ महीने, क्या सही था (थोडा मुश्किल होगा हम में से बहुत से पाठकों को सही का पता लगाना) क्या गलत? वैसे खुद मैं भाग्यशाली हूँ कि आपातकाल के बाद जन्म हुआ। और जानकारी तथा अनेक सम्मानित व्यक्तियों के विचार <a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/cluster/2005/06/050624_emergency_30years.shtml">यहां</a> पठें -Sankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1121636767675122512005-07-17T13:23:00.000-08:002005-07-22T22:07:01.620-08:00"मंगल पाण्डेय - राइजिंग स्टार" संगीत - एक दृष्टिकोण<div align="center"><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/7046/1319/1600/08poster1.jpg"></a><span style="color:#33ccff;"></span><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7046/1319/320/still31.jpg" border="0" /> <p align="right"><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/7046/1319/1600/poster.jpg"></a></p><br /><em><span style="color:#ff9900;"><strong>होली आयी रंग फूट पङे</strong> </span></em></div><div align="center"><span style="color:#ff9900;"><em>ये छलक छलक - </em><em>वो ढलक ढलक</em></span></div><div align="center"><em><span style="color:#ff9900;">फिर बाजे घुंघरू ढोल बङे</span></em></div><div align="center"><span style="color:#ff9900;"><em>ये छलक छलक -</em><em>वो ढमक ढमक</em></span></div><div align="center"><em><span style="color:#ff9900;">सब निकले हैं पी पीके घङे</span></em></div><div align="center"><span style="color:#ff9900;"><em>ये लपक लपक - </em><em>वो धुमक धुमक</em></span></div><div align="center"><em><span style="color:#ff9900;">छम छम नाचे परियों की धुनें</span></em></div><div align="center"><span style="color:#ff9900;"><em>ये धिरक धिरक - </em><em>वो मटक मटक</em></span></div><div align="center"><br /><em><span style="color:#ff9900;">ये छलक छलक - वो ढलक ढलक</span></em></div><div align="center"><em><span style="color:#ff9900;">ये छलक छलक - वो छमक छमक</span></em></div><div align="center"><em><span style="color:#ff9900;">ये लपक लपक - वो धुमक धुमक</span></em></div><div align="center"><span style="color:#ff9900;"><em>ये धिरक धिरक - वो </em><em>मटक मटक</em></span></div><div align="center"><em><span style="color:#ff9900;"></span></em> </div><div align="center"><em><span style="color:#336666;"></span></em></div><div align="center"><em><span style="color:#336666;"></span></em></div><div align="center"><em><span style="color:#336666;"></span></em></div><div align="justify">एक और उदाहरण है अख्तर साब के जादुई शब्दों का-</div><div align="justify"> </div><div align="justify"></div><div align="justify"></div><div align="center"><em><span style="color:#336666;"></span></em></div><div align="center"></div><div align="center"></div><div align="center"><span style="color:#336666;"></span></div><div align="center"></div><div align="center"></div><div align="center"><span style="color:#ff6666;">"चांदी की थाल से लेके गुलाल<br />अब राधा से खेलेंगे होली मुरारी<br />राधा भी तटखट है-<br />पलटी वो झटपट है<br />मारी कन्हैया को है पिचकारी</span></div><span style="color:#ff6666;"><div align="center"><br />देखने वाले तो दंग हुये हैं<br />के होली में दोनों संग हुये हैं<br />तो राधा कान्हा इक संग हुये हैं</div><div align="center"><br />कौन है राधा कौन है कान्हा<br />कौन ये समझा कौन ये जाना"</span> </div><div align="center"></div><div align="justify"> </div><div align="justify">आगे का कमाल पढिये -</div><div align="center"></div><div align="center"></div><div align="center"><span style="color:#009900;"></span> </div><div align="center"><span style="color:#009900;">"होली में जो सजनी से नैन लङे<br />थामी है कलाई कि बात बढे<br />तीर से जैसे मेरे मन में गढे<br />तेरी ये नजरिया जो मुझ पर पङे<br />जो ये रास रचे<br />जो ये धूम मचे<br />कोई कैसे बचे"</span> </div>Sankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14544917.post-1121627480511031342005-07-17T11:06:00.000-08:002005-07-20T09:42:49.120-08:00एक सफ़र अमीन सयानी के साथ<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/7046/1319/1600/review_r2_c51.gif"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7046/1319/320/review_r2_c51.gif" border="0" /></a> यूं तो संगीत के साथ हमेशा बंधे रहने का मन करता है, आख़िर एक प्यार है, एहसास है, जो एक मजबूत डोर की तरह एक अजीब से बंधन से बाँधे रख़ता है। अगर सही कहूँ तो न जाने कब से एक ख्वाहिश है मन में - रेडियो पर कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करने की, और मुझे यह कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं है कि यह ख्वाहिश "हूँ हूँ हूँ" एक ना भूलने वाले सफर के सिपहलेसलहार अमीन सयानी साहब के कारण आयी। <em><span style="color:#6633ff;">अपूर्ण...</span></em>Sankethttp://www.blogger.com/profile/12959812962276393150noreply@blogger.com